वैलेंटाइन डे – प्रेम का राजनीतिकरण! कितना सही? कितना गलत?


14feb वेलेंटाइन डे आते ही भारतीय समाज में उथल-पुथल शुरू हो जाती है। कुछ लोगों को लगता है हमारी संस्कृति खतरे में है तो कहीं दूर मस्जिद से आवाज आने लगती है, हराम है यह…

सवाल यह है कि क्या इन लोगों को भारतीय संस्कृति की समझ है? 5000 साल पुरानी सभ्यता इतनी कमजोर है?

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भगवान श्रीराम विवाह से पहले बाग में सीता से मिले थे दोनों एक दूसरे को पसंद करके मन ही मन में पति-पत्नी के रूप में देखने लगे थे..

भगवान श्री कृष्ण की वृन्दावन में राधा और अन्य गोपियों के साथ प्रेमलीला जग जाहिर है..

मनु और शृद्धा का सृष्टि सृजन….

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कालिदास का मेघ-यक्ष, ऊषा-अनिरुद्ध, उर्वशी-पुनर्वा, दुष्यन्त-शकुन्तला, पृथ्वीराज-संयोगिता, रत्नसेन-पद्मावती आदि की प्रेम कहानियों से भारतीय इतिहास भरा पड़ा है।

यह परंपरा यहीं तक ही नही सीमित रहती है, इसके आगे भी बढ़ती है चाहे ……
वह कबीरदास का — “ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय”

विवेकानन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर, महात्मा गाँधी का सम्पूर्ण मानवता से प्रेम…

सूफी संत, चैतन्य प्रभू, मीराबाई का प्रेम में खो जाना। या फिर आज नए रूपों में स्वेच्छा से विवाह, NGO द्वारा सामूहिक विवाह….

जिस संस्कृति के प्रेम का इतिहास 5000 साल से भी पुराना हो वह एक प्रतीकात्मक प्रेम दिवस 14feb से कैसे खतरा हो सकता है?

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प्रेम किसी भी सभ्यता, संस्कृति, देश, धर्म, समाज का आधार होता है, जहाँ प्रेम नही होता उस समाज है हाल हिटलर का होलोकास्ट, नाइजीरिया, सीरिया, इराक, अफगान के आतंकवाद की तरह होता है। संस्कृति अच्छी हो या बुरी इसकी खास बात है कि इसे खत्म नही किया जा सकता बस कभी-कभी यह रूप बदल लेती है…..

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हिटलर को लगा की वह यहूदियों को खत्म कर देगा पर क्या हुआ आज वह ज्यादा मजबूती से खड़े हैं। इसी तरह जिन लोगों को लगता है आधुनिकता से भारतीय समाज को खतरा है उनकी समझ में फेर है। उदाहरण के लिए जो बंगाल तक सीमित थी और गणेश पूजा पहले महाराष्ट्र तक सीमित थी, आज वह पूरे भारत में व्यापक रूप से मनाई जाती है।

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करवाचौथ का उत्सव आज की महिलाओं में पहले से कहीं ज्यादा है या फिर लड़का-लड़की जो सारा दिन जीन्स-टीशर्ट में रहते हैं शादी, उत्सवों में शेरवानी, कुर्ता, साड़ी, लहंगा पहने पहनने के लिए ज्यादा उत्साहित नज़र  आते हैं।

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पर अब एक सवाल उभर कर आता है जब प्रेम जीवन, संस्कृति का आधार है तो इस पर इतना हंगामा क्यों?
हंगामा है असामाजिक तत्वों के निजी स्वार्थ का क्योंकि प्रेम की अभिव्यक्ति बढ़ेगी तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य-शूद्र का जातीय आधार कमजोर होगा, हिन्दू-मुस्लिम में प्रेम होगा, स्त्री को आजादी मिलेगी तो उसका शोषण काम होगा। पर जिनकी रोटी ‘समाज के विभाजन’ से चलती है वह समाज को कैसे एक होने दे सकते हैं।

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उदाहरण- हिंदू-हिंदू चिल्लाने वालों ने कभी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य-शूद्र को एक होने दिया?

– इस्लाम-इस्लाम चिल्लाने वालों ने कभी शिया-सुन्नी, अहमदिया, रोहिमा को एक होने दिया?

उत्तर है नही ना…..
सब का अपना-अपना स्वार्थ है पर भुगतता तो आम आदमी है।

जिस तरह से विभिन्न संस्कृतियों से भरी पूरी दुनिया 21 जून को ‘योग दिवस’ के रूप में मनाती है….. उसी तरह पूरी दुनिया 14 फरवरी को “प्रेम दिवस” के रूप में मनाये और सिर्फ एक दिन के लिए—

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सगे भाई जिन्होंने सालों से बात नही की
– हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई
– ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र
– सिया-सुन्नी, अहमदिया, रोहगिया
– BJP, Congress, SP, BSP
– उत्तर भारत, दक्षिण भारत
– हिंदी, मराठी, बिहारी, तमिल, बंगला
– भारत, पाक, चीन, अमेरिका

सब अपना भेद-भाव,अहंकार ,ईर्ष्या, स्वार्थ भूलकर प्रेम-पूर्वक रहे तो शायद कभी प्रेम दिवस मनाने की जरूरत ही न पड़े क्योंकि प्रेम का अहसास इन्हें एक कर दे और प्रतीकात्मक Love day मनाने की ज़रुरत न पड़े।

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