शादी का कार्ड और सबका साथ सबका विकास


⁠⁠⁠भारतीय संस्कृति में शादी का बहुत ही अहम् हिस्सा होता है। 90% से अधिक शादियाँ arrange marriage होती हैं, इससे आप समझ सकते हैं कि लड़का-लड़की खोजना भी मुश्किल काम है लेकिन इससे भी मुश्किल काम होता है शादी के कार्ड का चयन करना। दशों दुकान में जाते हैं, कई कार्ड देखते हैं, कई लोगों से सलाह लेते हैं तब जाकर कार्ड का चयन होता है। इस प्रक्रिया के बाद कार्ड की छपाई का काम शुरू होता है जो मुख्यतः दो प्रकार से होता है….

पहला so called सभ्य लोगों का जिसमे दर्शनाभिलाषी, निवेदक आदि जगहों में सिर्फ घर के पुरुषों का ही नाम होता है, ऐसा लगता है कि उस घर में औरतों, लड़कियों, बच्चों की जगह ही नही है।

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दूसरा कार्ड उन परिवारों का होता है जिसमे दादा-दादी, चाचा-चाची, मम्मी-पापा, दीदी-जीजा तथा छोटे बच्चे- शादी में जुलूल से जुलूल आना का जिक्र होता है और ऐसा प्रतीत होता है कि शादी समारोह में घर के हर सदस्य की ससम्मान भागीदारी है।

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अब प्रश्न है कि आप किस कार्ड को बेहतर कहेंगें?

एक अनुमान के तहत मुझे लगता है कि आप दूसरे कार्ड को पसंद करेंगे।

अब यही प्रश्न भारत की संस्कृति के विषय में उठता है जहाँ कश्मीर है, पूर्वोत्तर है, सुदूर तमिल, अंडमान और लक्षद्वीप है। अनेक धर्म, भाषा, बोली, लिपि, खान-पान, पहनावा है। जब भारत इतना बड़ा व्यापक क्षेत्र और संस्कृति को समेटे हुए है तो शादी के पहले कार्ड की तरह सिर्फ वैदिक भाषा, वैदिक संस्कृति, वैदिक ज्ञान, वैदिक ग्रन्थ, वैदिक खान-पान पूरे भारत का कैसे प्रतिनिधित्व कर सकता है?

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वैदिक संस्कृति की शुरुवात से पहले और उसके साथ-साथ सैकड़ों साल से भारत में अनेक संस्कृतियाँ हैं पर क्या उनके ज्ञान-विज्ञान, खान-पान, पहनावा, रहन-सहन को सम्मान मिला है। कुछ तो खास बात होगी जो हजारों साल से उनको जिन्दा रखे है। यह वैदिक संस्कृति आक्रमण है जो सैकड़ों साल से दूसरे को उचित सम्मान न देते हुए अपनी विचार-धरा थोपता आया है और इसी का परिणाम है कि जातिवाद,अलगाव  का दंश हर भारतीय झेल रहा है।

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कुछ बुद्धिमान लोग … मुस्लमान, ईसाई, पारसी आदि पर विदेशी होने का आरोप लगाते हैं। इस आरोप पर बहस करे तो मुस्लमान भारत ने 1500 साल पहले आये थे तो दूसरा आरोप भी बहस करो की वैदिक संस्कृति को स्थापित करने वाले आर्य 2500 साल पहले विदेश से ही तो आये थे और उससे 30000 साल पहले अफ्रीका से आदिमानव आया था तो देशी-विदेशी की बहस ही बेकार है।

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भारतीय संस्कृति यूरोप की तरह नही है जहाँ सब पिघल का केक बन जाती है। हमारी संस्कृति महाराजा थाली की तरह है जिसमे हर कटोरी की अपनी पहचान है। इसी पहचान की वजह से भारतीय मुसलमान कट्टरवाद से बचा हुआ है। हो सकता है किसी इस्लामिक देश में मुस्लमान कट्टर होते हैं लेकिन यह भारतीय संस्कृति में सही नही है। इस बात का प्रमाण हाल ही हुए अध्ययन से मिलता है। ISIS  जो दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकी संघठन है जिसमे अमेरिका से 250, इंग्लैंड से 750 मुसलमान भर्ती हुए लेकिन भारत से सिर्फ 23 मुसलमान गए हैं जबकि भारत में मुस्लिम की आबादी इंग्लैंड, अमेरिका की आबादी से 100 गुना से ज्यादा है।

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अतः हमको आने नजरिये को बदलने की जरुरत है। सबकी संस्कृति को सम्मान देकर देश को अलगाववाद, नक्स्लवाद, कट्टरवाद से बचाया जा सकता है और कोई दूसरा रास्ता है ही नहीं। इसकी शुरुवात का सबसे सही स्थान हमारे शिक्षण संस्थान हैं। आप आने आस-पास ऐसे तमाम स्कूल-कॉलेज देखते हैं जहाँ कॉलेज प्रशासन की तरफ से official रूप से सरस्वती पूजा, जन्माष्टमी, होली, दिवाली मनायी जाती है लेकिन क्या कॉलेज प्रशासन official रूप से ईद या क्रिसमस मनाता है? तो उत्तर में मिलता है कि सरकारी छुट्टी के अलावा कोई प्रोग्राम नहीं होता। जब स्कूल के बच्चे एक दुसरे के culture में भाग नही लेंगे तो सम्मान कैसे करेंगे यही से अलगाववाद की भावना जन्म लेती है जो धीरे-धीरे करके अलग ही कर देती है। स्कूल में  त्यौहार मानाने का एक ही concept होना चाहिए “सब के त्यौहार – सब के साथ ” एक दम compulsory…….

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अभी भी देर नही हुयी है हमें दूसरों की संस्कृति, धर्म, खान-पान शादी से दूसरे वाले कार्ड की तरह पहनाना का सम्मान करना सीख ले और कमियों को बात-चीत, नियम-कानून से दूर करें।समय के साथ समाज, बिचारधारा में परिवर्तन ज़रूरी है 6th शताब्दी की बातें आज के दौर में परिवर्तन मांगती है और सरकार को देश विदेश में दिब्यान्गो, महिलाओं, बच्चों, मानवाधिकारों के बारे में जवाब देना होता है अब चाहे BJP-Congrees जिसकी सरकार हो परिवर्तन तो करेगी ही क्यों संयुक्त राष्ट्र को जवाब देना होता है।

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बेहतर होगा 3 कमियां मुसलमान, हिन्दू की बताये और 3 कमिया हिन्दू, मुसलमान की बताये और दोनों समाज अपने स्तर में उन्हें दूर करें। इससे कमियां भी दूर हो जाएंगी साथ में टकराव भी नही होगा…. नहीं तो बंगाल से शुरू हुआ नक्सलवाद पूरे भारत में होगा, 23 कट्टरवादियों की संख्या 23 हजार पहुँचेगी या फिर आर्मी पूरे  देश में AFSPA लगाके सब को रोकेगी। ये दोनों ही बातें देश के लिए बिल्कुल सही नही हैं।

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प्रत्येक  समाज को “हम सब सही हैं, हम सब अच्छे हैं और आप सब गलत हो आप सब बुरे हो” कहने से पहले लाख बार सोचना चाहिए क्योंकि हर समाज में आपराधिक तत्व होते हैं और उनसे निपटने के लिए हमें पुलिस का पूरा सहयोग करना चाहिए और दोनों समाज के युवा एक दूसरे पर आरोप लगाने के बजाय अपनी अपनी कुरीतियों को दूर करने का सक्रिय  प्रयास करे।

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आपस में बात- चीत का रास्ता तो बिलकुल ही न बंद करें। हर समाज में थोड़ी-बहुत असुरक्षा की भावना होती है और कभी कभार छिटपुट लड़ाई झगड़े आपस में बात -चीत का रास्ता बंद कर देतें है। इसी isolation का फायदा साम्प्रदायिक ताकतें उठती है क्यों की isolation में कुएं के मेढक जैसे हालात होते हैं जो नित्य पानी को और गन्दा करते है ……

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अतः शादी के दूसरे card की तरह हकीकत में सबका साथ – सबका विकास हो खाली नारा देने से काम नही चलेगा।

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